शनिवार, 9 जनवरी 2010

हिन्दी फ़िल्मों में हिन्दी : बालीवुड मे साहित्य

बहुत बरस पहले सुना था कि मुन्शी प्रेमचन्द भी माया नगरी पहुंचे थे. कुछ फ़िल्मों के लिए पटकथाएं भी लिखीं. नागर जी और उनकी सुपुत्री, भगवती बाबू, रेणु जी (शैलेन्द्र की वजह से), नीरज, आज कल उदय प्रकाश, बीच मे मन्नू जी, राजेन्द्र जी, कमलेश्वर, धर्मवीर भारती, बच्चन जी आदि आदि अनेक नाम कभी न कभी बालीवुड से जुड़े थे. लेकिन तथाकथित हिन्दी फ़िल्मों के व्यवसाय के कर्ता धर्ता यानी निर्माता, निर्देशक और अभिनेता/अभिनेत्रियां हिन्दी से इतनी दूर नज़र आते हैं कि ऐसा लगता है कि हिन्दी इनके लिए मात्र कमाई की भाषा ही है, बोल चाल की नहीं.

ऐसा क्षेत्रीय फ़िल्मों से जुड़े लोगो में तनिक कम लगता है. लगभग सभी क्षेत्रीय भाषाओं के अभिनेतागण सार्वजनिक रूप से और मीडिया पर भी अपनी अपनी भाषा में ही बात-चीत करते नज़र आते है. बांग्ला, कन्नड़, तमिल, तेलुगू, मलयालम, मराठी आदि भाषाओं के फ़िल्म कलाकार अपनी अपनी भाषा के साहित्य से भी वाकिफ़ लगते हैं. अफ़सोस की बात है कि हिन्दी फ़िल्म उद्योग से जुड़े लोगों को हिन्दी साहित्य से कोई जुड़ाव हो ऐसा कभी भी नहीं लगता. बालीवुड के आज के स्टारों मे एक अमिताभ जी को छोड़ कर शायद ही कोई हो जो हिन्दी मे वार्तालाप कर सके. आश्चर्य तो तब होता है जब हिन्दी पट्टी से पहुंचे कलाकार, जो हिन्दी नाटकों से हो कर आगे बढ़े हैं, एकदम से अंग्रेज़ीदां बनने की कोशिश करने लगते हैं. मनोज बाजपेयी, शेखर सुमन आदि को क्या कहें.

बहुत पहले देवानन्द और वहीदा अभिनीत एक फ़िल्म देखी थी - ’काला बाज़ार’. फ़िल्म की कहानी तो अब ठीक ठीक नही याद है, पर एक ऐसा दॄश्य है फ़िल्म में जब नायिका अपने कालेज के पास एक बाग मे बैठ कर एक किताब पढ़ रही होती है, और कैमरा ज़ूम होने पर दिखता है कि वह पुस्तक ’कामायनी’ है. आजकल पहले तो फ़िल्मी पात्र पर्दे पर कुछ पढ़ते नज़र आते ही नहीं, और अगर ऐसा गलती से कभी हो भी जाए तो उनके हाथों में हिन्दी की कोई किताब तो शायद ही होगी. (यदि आपको कोई किरदार पर्दे पर कोई किताब पढते नज़र आया हो तो कॄपया ज़रूर बताएं.)

मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

RAAZ

क्या मजे की बात हैजब जी चाहे टाइम मशीन का समय चक्र घुमाया और जा पहुंचे पुराने समय मेंमिल आये तत्कालीन रिश्तेदारों से, दोस्तों से, दुश्मनों से और चाहे तो कुछ भूल सुधार भी कर आयेऐसा ही कुछ लगता था मुझेजब पहली बार मैंने एक लोकप्रिय अंग्रेज़ी फिल्म "Timecop" देखी। Van Dam की इस फिल्म में खलनायक समय सेपीछे जा कर अपराध करता थाउदाहरण के लिए, वह १९३० के दशक में जा कर मंदी के दौर की कंपनियों के शेयर औनेपौने दामों में खरीदता था और फिर वर्तमान में लौट आता था और उन्हीं कंपनियों पर कब्ज़ा कर लेता था अपने शेयरहोल्डिंग की बदौलतएक अन्य बदमाश वर्तमान से अत्याधुनिक स्वचालित मशीन गन ले कर १९ वीं शताब्दी में जाकर खज़ाना लूटता था फिर मजे से वापस लौट आता थाकुछ इसी तरह की चीज़ें कॉमिक्स में भी मिलती हैं
हाँ कुछ अजीब से प्रश्न ज़रूर आते थे मन में जो इस तरह की फिल्मों में ठीक से उत्तरित नहीं होते थेजैसे जब आपविगत में जा कर कुछ बदलते हैं, तो उनके परिणाम तब से ले कर अब यानी वर्तमान तक कुछ कुछ ज़रूर बदलेंगेफलस्वरूप जब हम वापस वर्तमान में लौटेंगे तो वह वैसा ही नहीं रहेगा जैसा हम उसे छोड़ कर गए थे
विज्ञानं फंतासियों के अलावा ऐसे विचारों को शायद ही कोई गंभीरता से लेता हो

लेकिन.... इट हैपेन्स ओनली इन इंडियाकुछ समय पहले एक रिअलिटी शो आरंभ हुआ है 'राज़..पिछले जन्म का' एनडी टी वी इमेजिन पर जहाँ प्रतिभागी बड़े नाटकीय तरीके से अपने पूर्व जन्म में चले जाते हैं (यह समय यात्रा से भीआगे की चीज़ है भाई) और उन्हें सब कुछ याद जाता है, कि उनकी मृत्यु कैसे हुई, पिछले जन्म में कौन माँ बाप थे, आदि आदिप्रेमाईस ये है कि यदि आपको कोई चीज़ बेचैन करती है, किसी प्रकार का भय है, या ऐसा ही कुछ तो ज़रूरइसका रिश्ता पूर्व जन्म से हैतो अब आप पूर्व जन्म में जाइये, अपनी वर्तमान समस्या का निश्चित कारण 'देखिये'। और वापस आइये आपकी उद्विग्नता समाप्त या कम हो जाएगीतो जैसे ही सेलिना जेटली कहती हैं कि उन्हें 'सोल मेट' कि तलाश है, दर्शक समझ जाता है कि ज़रूर पूर्व जन्म में इनका कोई ब्रेक अप हुआ थावाह वाह

कोई भी इस अंधविश्वास से भरे और तर्क से परे कार्यक्रम का विरोध नहीं करता, कि 'पास्ट लाइफ थेरेपी' आजकल 'इनथिंग' हैइलीट वर्ग का नया शगलतो मध्य वर्गीय जनता को सास बहू के आगे भी नया कुछ दिखाप्रिंट मीडिया याचैनेलीय मीडिया कहीं भी कुछ सुगबुगाहट नहींसूचना और प्रसारण मंत्रालय भी सोया हैजबकि उसके ही एक नियम '
Cable Television Network Rules, 1994 (Rule 6-1-j) के तहत अंधविश्वास फैलाना जुर्म है।

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सोमवार, 7 दिसंबर 2009

तुमने बाबर की तरफ फेंके थे सारे पत्थर
है मेरे सर की खता ज़ख्म जो सर में आये
पांव सरयू में अभी राम ने धोये भी न थे
के नज़र आये वहां खून के गहरे धब्बे
पांव धोये बिना सरयू के किनारे से उठे
राम यह कहते हुए अपने द्वारे से उठे
राजधानी की फ़िज़ा आयी नहीं रास मुझे
छह दिसंबर को मिला दूसरा बनवास मुझे।

'कैफ़ी आज़मी'


रविवार, 6 दिसंबर 2009

क्या कहूं

आज शाम को जब मैं पत्रिका की दुकान पर खड़ा था तो वह आदमी वहां पहले से ही खड़ा था। शायद मेरे ही जैसे किसी व्यक्ति के इंतज़ार में था। नज़रें मिलते ही वो मेरे पास आया औरबोला, 'साब ज़ी, थोड़ी मदद कर दो। बड़ा एहसान होगा। ' यह जान कर भी कि ऐसा नहीं है मैं मन ही मन प्रार्थना कर रहा था कि वो सामान्य भिखारी निकले।
मैंने तोलने की दृष्टि से उसे देखा। वो करीब ३५-३६ वर्षीय युवक था।मध्यम कद, थोड़ा गोल सा चेहरा, थोड़े कम बाल। कपड़े थोड़े पुराने और जाड़े के हिसाब से थोड़े कम. शायद वो नेपाल से था। असमिया भी हो सकता था। बोली से वो इन दोनों ही तरह का लग रहा था। जैसे जी को ज़ी कहना। गो मैं उसकी बात सुनने का प्रयास कर रहा था, चेहरे से येही ज़ाहिर कर रहा था कि मैं बिल्कुल भी तवज्जो नहीं दे रहा हूँ और दूकानदार से बात करने में व्यस्त हूँ। तभी उस आदमी ने कुछ कहते हुए नीचे की ओर इशारा किया। चाहते हुए भी मेरी निगाह उस ओर घूम गई। एक महिला, एक ११-१२ वर्ष की सुंदर पर मैल भरे चेहरे वाली लड़की, और एक - वर्षका कमज़ोर सा लड़का वहीं ज़मीन पर बैठे थे। एक लोहे का बक्सा, एक गठरी और एक चेन वाला बैग जैसा स्टेशन रोड की दुकानों में मिलता है, उनके पास पड़े हुए थे। छोटा बच्चा बैग पर बैठा था। उसकी माँ और बहिन ज़मीन पर उकडूं बैठे थे। मैं उनकी हालत समझना चाहता था। पर डरता था कि कही वे गले पड़ जायें। बहुत हद तक ये लगता था कि वे किसी बड़े बंगले में काम करते रहे होंगे। आदमी चौकीदारी का, बीवी झाड़ू-पोंछे-बर्तन का कमकरती रही होगी। लड़की शायद माँ का हाथ बंटाती रही होगी। और लड़का शायद स्कूल जाता रहा होगा। शायद इन्हें एक साथ नौकरी से निकाल दिया गया हो। जल्दी से मैंने अपना ध्यान उसके परिवार कि ओर से हटाया। कहीं में द्रवित हो कर सचमुच पैसे दे बैठूं। तभी उस आदमी की अस्पष्ट आवाज़ फिर सुनाई पड़ी और मैं वर्तमान में लौटा 'साब ज़ी, पचास रूपया दे दो तो हम लोग कुछ खा लें।'
मैं फिर सोचने लगा। 'आखिर इन्हें क्यों निकला गया होगा।और जो ज़वाब सूझा वो था 'ज़रूर इन्होंने चोरी की होगी। और किसी चोर को कोई अपने घर में क्यूँ रखेगा।'
- ' they got what they deserved. फिर मैंने अपने तर्क पर ख़ुद को शाबाशी दी, दुकानदार को भुगतान किया, औरउस आदमी से नज़रें मिलाये बिना सामान की लिस्ट पर नज़र रखते हुए तेज़ क़दमों से वहां से चल दिया।
और अब रात के बारह बजे, पिछले डेढ़ घंटे से ख़ुद से लड़ रहा हूँ। क्या मुझे पैसे दे देने चाहिए थे? क्या वे वाकई चोर थे? या ये मेरा convenient तर्क था? या मैं भी hypocrite होता जा रहा हूँ?

मंगलवार, 16 दिसंबर 2008

एक kavita

मित्रों ये कविता मैंने बहुत साल पहले लिखी थी। अगर आपकी अच्छी लगे तो ज़रूर कहियेगा।

प्रश्न
शब्द सारे हो गए स्थिर विवशता क्यूँ इस कदर है,
गीत मेरे मौन क्यूँ हैं
मूक मेरे नैन क्यूँ हैं
क्या हमेशा अकेला ही चना होगा फोड़ने को भाड़
क्या कोई साथ देगा जब चलूँगा रोकने पतझार?
क्या कोई कर बढ़ेगा जब बढूँगा थामने पतवार?
प्रश्न पर प्रतिप्रश्न है,
प्रतिप्रश्न पर फिर प्रश्न है
क्या कभी मैं पा सकूंगा इन सवालों के जवाब?
एक यह भी प्रश्न है

मंगलवार, 9 दिसंबर 2008

shubharambh

सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयः
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, माँ कश्चित्दुख भाग भवेत्

यही इच्छा है कि विश्व में शान्ति हो। क्लेश दूर हों। संताप मिटे।
सबसे बड़ा सवाल तो येही है कि आखिर कैसे?
सोचते हैं और लिखते हैं।
शुभ रात्रि।