मंगलवार, 16 दिसंबर 2008

एक kavita

मित्रों ये कविता मैंने बहुत साल पहले लिखी थी। अगर आपकी अच्छी लगे तो ज़रूर कहियेगा।

प्रश्न
शब्द सारे हो गए स्थिर विवशता क्यूँ इस कदर है,
गीत मेरे मौन क्यूँ हैं
मूक मेरे नैन क्यूँ हैं
क्या हमेशा अकेला ही चना होगा फोड़ने को भाड़
क्या कोई साथ देगा जब चलूँगा रोकने पतझार?
क्या कोई कर बढ़ेगा जब बढूँगा थामने पतवार?
प्रश्न पर प्रतिप्रश्न है,
प्रतिप्रश्न पर फिर प्रश्न है
क्या कभी मैं पा सकूंगा इन सवालों के जवाब?
एक यह भी प्रश्न है

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